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Korba : बालको की जर्जर सड़कों पर बिखरती जिंदगी, जब रक्षक ही मौन हों तो न्याय किससे मांगें ? दो घरों के बुझ गए चिराग

वेदांता की ऊंची चिमनियों से निकलता धुआं या कोरबा की बेबस जनता का दम? मुनाफे के ठेकेदारों की क्या मर चुकी है संवेदनाएं ?

कोरबा : तरक्की की चमचमाती लाइटों के पीछे जब किसी घर का चिराग बुझता है, तो उसका अंधेरा सिर्फ वही परिवार महसूस कर सकता है। मंगलवार को बालको रिंग रोड पर हुआ हादसा महज एक ‘सड़क दुर्घटना’ नहीं बल्कि व्यवस्था की घोर संवेदनहीनता और मुनाफे की अंधी दौड़ का एक और खूनी अध्याय है। दो मासूम जिंदगियां असमय काल के गाल में समा गईं,और पीछे छोड़ गईं चीखें सूने आंगन और एक सुलगता हुआ सवाल क्या वाकई आम इंसान की जान की कीमत अब कीड़े-मकौड़ों से ज्यादा नहीं रही?

गड्ढों में दफन होती व्यवस्था और दौड़ते यमराज

कोरबा, दर्री, रीसदी से बालको को जोड़ने वाली सड़कें अब मार्ग नहीं बल्कि हादसों के लाइव कॉरिडोर बन चुकी हैं। एक तरफ हर कदम पर धोखा देते गहरे गड्ढे हैं, तो दूसरी तरफ यमराज के रूप में बेखौफ दौड़ते अनियंत्रित मालवाहक भारी वाहन। इन दोनों पाटों के बीच बेबस और लाचार पिस रही है आम जनता जो रोज सुबह घर से यह दुआ मांगकर निकलती है कि शाम को सही-सलामत लौट आए।

अरबों-खरबों का टर्नओवर करने वाला वेदांता बालको प्रबंधन सीएसआर और मूलभूत सुविधाओं के दावों के बड़े-बड़े ढोल तो पीटता है लेकिन जमीनी हकीकत इन बदहाल सड़कों की धूल और गिट्टियों में बिखरी पड़ी है। चाहे वह नियमों को ताक पर रखकर की जा रही अवैध पेड़ कटाई हो या सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का खेल उद्योगपतियों की इस सल्तनत में नियम-कायदे सिर्फ कागजों तक महदूद नजर आते हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और मार्मिक पहलू यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने अपनी आवाज बनाकर चुना था वे आज बालको प्रबंधन की चौखट पर नतमस्तक नजर आते हैं।

समय-समय पर मंचों से प्रबंधन की सराहना के कसीदे गढ़े जाते हैं, जबकि जनता सड़कों पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। जब रक्षक ही प्रशंसा के गीतों में मशगूल हों तो जिला प्रशासन और पुलिस की लाचारी भी एक तयशुदा स्क्रिप्ट जैसी लगने लगती है। धिक्कार है ऐसे सिस्टम पर जहाँ इंसान की सांसों का मोल कॉरपोरेट के मुनाफे से तौला जाता है। जब तक जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं नहीं जागेंगी तब तक सड़कों पर यूं ही माताओं की गोद सूनी होती रहेगी। बालको प्रबंधन की इस घोर लापरवाही पर जिला प्रशासन सख्त रुख अख्तियार करने से क्यों हिचक रहा है?

हर दूसरे दिन होने वाली मौतों के बाद भी सड़कों की मरम्मत के लिए किसी युद्धस्तर की योजना की शुरुआत क्यों नहीं की जा रही? रिहायशी और संपर्क मार्गों पर भारी वाहनों की बेकाबू रफ्तार को नियंत्रित करने में यातायात पुलिस इतनी लाचार क्यों है? यह आक्रोश सिर्फ चंद शब्दों का नहीं बल्कि हर उस नागरिक की तड़प है जो रोज़ इस मौत के सफर से गुजरता है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। प्रशासन और प्रबंधन को यह समझना होगा कि जनता का सब्र अगर टूटा तो उसकी गूंज किसी भी कॉरपोरेट साम्राज्य की दीवारों को हिलाने के लिए काफी होगी।

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