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कोरबा में गौरा पूजा महोत्सव के मंच में ननकीराम कंवर की अनदेखी ने बढ़ाई गुटबाजी की चर्चा, CM के PSO ने कंवर को कुर्सी से उठाकर कहा…

कोरबा : कोरबा में वनवासी कल्याण आश्रम स्थापना दिवस और गौरा पूजा महोत्सव में एक बार फिर बीजेपी की गुटबाजी देखने को मिली। यह आयोजन उस वक्त राजनीतिक मायने में अहम हो गया, जब मंच पर बैठने की व्यवस्था ने भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी को सार्वजनिक मंच पर उजागर कर दिया। पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकीराम कंवर की मंच पर दूसरी पंक्ति में मौजूदगी और शुरुआती तौर पर उनकी अनदेखी ने कोरबा की सियासत गरमा दी है। ऐसा नहीं है कि इस नजारे पर किसी की नजर नही पड़ी, लेकिन नजर पड़ने के बाद भी जिम्मेदार नेता ने इस पूरे नजारे को नजर अंदाज कर दिया गया, जो कि अब चर्चा का विषय बन गया है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय रविवार को कोरबा प्रवास पर पहुंचे थे। यहां वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित गौरा पूजा महोत्सव में पहुंचे मुख्यमंत्री साय के साथ उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन, वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर, महापौर संजूदेवी राजपूत के साथ ही भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी मौजूद थे। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री के आगमन के साथ ही मंच पर नेताओं की बैठने की व्यवस्था पर सभी की नजरें टिक गईं। आदिवासी समाज में गहरी पकड़ रखने वाले और राज्य की राजनीति में लंबा अनुभव रखने वाले ननकीराम कंवर मुख्यमंत्री साय के ठीक पीछे दूसरी पंक्ति में बैठे दिखे।

वीडियों में देखा जा सकता है कि जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी ने उन्हें उसी स्थिति में देखेने के बावजूद कोई पहल नहीं की। यह दृश्य अब कोरबा के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि ननकीराम कंवर न केवल पूर्व गृहमंत्री रह चुके हैं, बल्कि भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने पार्टी को आदिवासी अंचलों में मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि जो काम बीजेपी के जिम्मेदार पदाधिकारी को करना था, उसी काम को कुछ समय बाद मुख्यमंत्री साय के PSO ने किया। PSO  ने ननकीराम कंवर को मंच की दूसरी पंक्ति में बैठा देख तुरंत ही उन्हे पहली पंक्ति में जाकर बैठने का आग्रह किया। इसके बाद ननकीराम कंवर आगे की पंक्ति में जाकर बैठे।

राजनीतिक जानकारों की माने, तो यह पूरा घटनाक्रम औपचारिक शिष्टाचार की कमी से कहीं आगे बढ़कर राजनीतिक गुटबाजी की ओर इशारा करता है। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अब चर्चा का विषय है कि ये पूरा यह घटनाक्रम महज एक चूक थी या फिर जानबूझकर दिया गया राजनीतिक संदेश ? कोरबा भाजपा में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह घटना इसलिए अहम मानी जा रही है, क्योंकि मंच और सार्वजनिक कार्यक्रम राजनीति के सबसे संवेदनशील संकेतक होते हैं। कौन कहां बैठा, किसे कितना महत्व मिला, इन बातों को पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक गंभीरता से लेते हैं।

ननकीराम कंवर जैसे वरिष्ठ आदिवासी नेता की शुरुआती अनदेखी ने यह धारणा मजबूत कर दी है कि संगठन के भीतर कुछ धड़े पुराने नेताओं की भूमिका को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं राजनीतिक जानकारों की माने तो आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की रणनीति के लिहाज से यह घटनाक्रम चिंताजनक संकेत है। ऐसे में उन्हें सार्वजनिक रूप से कमतर दिखाना….चाहे वह अनजाने में हुआ हो या जानबूझकरए पार्टी के आदिवासी आधार को असहज कर सकता है। दूसरी ओर जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि स्थानीय स्तर पर संगठन की कमान संभाल रहे नेता से हमेशा अपेक्षा की जाती है कि वे वरिष्ठ नेताओं के सम्मान और संतुलन का ध्यान रखें।

इस मामले में उनकी चुप्पी और निष्क्रियता ने पार्टी में व्याप्त गुटबाजी को एक बार फिर बल दे दिया है। कुल मिलाकर देखा जाये तो गौरा पूजा महोत्सव जैसे धार्मिक आयोजन में घटा यह घटनाक्रम कोरबा की राजनीति में बड़े संकेत छोड़ गया। मंच की दूसरी पंक्ति से पहली पंक्ति तक का यह सफर सिर्फ कुर्सी बदलने का नहीं था, बल्कि उसने यह साफ कर दिया कि जिले की सियासत में अंदरखाने चल रही गुटबाजी अब सार्वजनिक होने लगी है।

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