कोरबा : कोरबा जिले में पुलिस की सख्ती के बाद भी कबाड़ माफिया के हौसले बुलंद नजर आ रहे है। ताजा मामला बांकी मोंगरा थाना क्षेत्र का है, जहां एसईसीएल की सुराकछार भूमिगत खदान में दो दर्जन से अधिक कबाड़ चोरों ने धावा बोलकर डकैती की सनसनीखेज वारदात को अंजाम दिया। बदमाशों ने सुरक्षाकर्मियों से मारपीट करने के साथ ही मोबाइल और नकदी लूट ली। इसके बाद खदान क्षेत्र से केबल काटकर फरार हो गए। एसईसीएल की खदान क्षेत्र में हुए इस घटना ने एक बार फिर जिले की कानून-व्यवस्था और बांकी मोंगरा पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक बांकी मोंगरा थाना क्षेत्र में ये वारदात 26 जून की देर रात घटित हुई। बताया जा रहा है कि एसईसीएल की सुराकछार भूमिगत खदान में देर रात 20 से 25 की संख्या में नकाबपोश बदमाश घुस आए। उस समय 3-4 नंबर खदान में सुरक्षा कर्मी परमात्मा, चेतन, जयपाल, विश्वनाथ राठौर और लक्ष्मीनारायण नाइट शिफ्ट की डयूटी में तैनात थे। आरोप है कि बदमाशों ने पहले सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर उन्हें बंधक बना लिया। इसके बाद खदान के हाजिरी बाबू विश्वनाथ राठौर के केबिन में पहुंचकर उनके साथ मारपीट की और मोबाइल फोन के साथ पर्स में रखे 4,500 रुपये लूट लिए।
घटना में घायल कर्मचारियों को अगले दिन विभागीय अस्पताल में भर्ती कराया गया। सूत्रों की माने तो वारदात के बाद बदमाश खदान परिसर में लगे कीमत के कॉपर केबल काटकर अपने साथ ले गए। पूरी घटना को जिस सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, उसने सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यह पहली बार नहीं है जब बांकी मोंगरा थाना क्षेत्र में कबाड़ चोरों ने बड़ी वारदात को अंजाम दिया हो। पिछले लंबे समय से एसईसीएल की खदानें, निर्माणाधीन रेलवे लाइनें और सरकारी संपत्तियां कबाड़ माफिया के निशाने पर हैं।
पुलिस की FIR पर भी उठे सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा विवाद अब बांकी मोंगरा पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को लेकर सामने आया है। घटना से जुड़े दस्तावेज और एफआईआर में गंभीर विरोधाभास दिखाई दे रहा है। खदान के हाजिरी बाबू विश्वनाथ राठौर ने अपनी लिखित शिकायत में स्पष्ट उल्लेख किया है कि 20 से 25 बदमाश खदान में घुसे थे। शिकायत के मुताबिक 5 से 6 बदमाश हाजिरी रूम में पहुंचे, जहां उन्होंने उनके साथ मारपीट की, मोबाइल फोन और पर्स में रखे 4,500 रुपये लूट लिए। लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में इस कथित लूट का उल्लेख नहीं है। एफआईआर और शिकायत के बीच दिखाई दे रहा यह विरोधाभास पुलिस की विवेचना की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।












































