रायपुर : नवा रायपुर के ग्राम नकटी में शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी है। बुलडोजर की तस्वीरें देखकर कई लोग भावुक हो रहे हैं, लेकिन क्या वाकई ये सब “बेबस गरीब” थे? या फिर लंबे समय से चला आ रहा गरीबी का दिखावा करके सरकारी जमीन हथियाने का सुनियोजित खेल? प्रशासन के आंकड़ों और सूची के अनुसार, कई कब्जाधारियों ने बहुत बड़े-बड़े रकबों पर कब्जा जमाया हुआ था। उदाहरण के तौर पर:
- देवकुमार (पिता बिसहत रात्रे): 29,700 वर्गफुट
- जानकी (पति गणेश साहू): 29,600 वर्गफुट
- मुकेश (पिता मनहरण पाल): 19,800 वर्गफुट
- माया राम, दूरपति, घसिया, राजलाल, कला बाई, भूरी पाल आदि कई लोगों ने 10,000 से 18,000 वर्गफुट तक की जमीन पर कब्जा किया हुआ था।
नकटी की इस सरकारी भूमि (भाटा/चरागाह) का स्थानीय बाजार मूल्य लगभग ₹5,000 प्रति वर्गफुट है। यानी सिर्फ एक व्यक्ति के 29,700 वर्गफुट कब्जे की अनुमानित कीमत ₹14.85 करोड़ बनती है। एक नहीं, कई ऐसे कब्जे थे जिनकी कुल कीमत करोड़ों में है।
सवाल उठता है – 14 करोड़ की जमीन पर कब्जा करने वाला व्यक्ति गरीब कैसे?
गरीब परिवार के पास इतना बड़ा भू-भाग कहाँ से आया? सामान्य गरीब तो एक छोटा-सा झोपड़ा भी बनाने के लिए संघर्ष करता है। यहाँ तो बड़े-बड़े मकान बने थे, कुछ लोगों ने जमीन बेचकर 50 लाख तक का मकान बनाया, पशुधन था, आर्थिक संसाधन थे। वर्षों से चले आ रहे नोटिसों के बावजूद कब्जा नहीं छोड़ा। शासन के रिकॉर्ड में इनके पूर्वजों का नाम भी नहीं मिला।
गरीबी का दिखावा, मकसद था जमीन हथियाना
ये लोग “गरीब” बनकर सहानुभूति बटोरना चाहते थे, लेकिन हकीकत कुछ और है। सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार रायपुर में 800-1000 वर्गफुट का छोटा प्लॉट खरीदने के लिए जीवन भर की कमाई, EMI और टैक्स चुकाता है। वहीं ये लोग हजारों-दसियों हजार वर्गफुट सरकारी भूमि पर कब्जा जमाकर आराम से रह रहे थे।
क्या गरीबों के मकान इतने बड़े भू-भाग पर बन सकते हैं?
नहीं। यह स्पष्ट रूप से अतिक्रमण का माफिया और जमीन हथियाने का खेल था। कुछ लोग तो इतने सक्षम थे कि लाखों-करोड़ों की सरकारी संपत्ति को निजी बना लिया। प्रशासन ने इन परिवारों को सेक्टर-30, नवा रायपुर में फ्लैट दिए हैं – जिनकी बाजार कीमत लगभग ₹8 लाख है। प्रधानमंत्री आवास योजना वाले प्रभावितों के लिए भी समान व्यवस्था की गई है। पुनर्वास के साथ रोजगार, शिक्षा और पशुधन की व्यवस्था भी की जा रही है। फिर भी कुछ लोग इसे “अत्याचार” बता रहे हैं।
कानून सबके लिए बराबर
संवेदना अपनी जगह, लेकिन कानून का राज सबसे ऊपर है। अगर आज इन बड़े कब्जों को भावनाओं के नाम पर बर्दाश्त किया गया तो कल कोई और करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प लेगा। ईमानदार नागरिक जो टैक्स देता है, नियमों का पालन करता है, उसके साथ अन्याय कैसे हो? सरकार को गरीबों की मदद करनी चाहिए, लेकिन गरीबी का ढोंग करके सरकारी संपत्ति लूटने वालों को नहीं।
नकटी की यह कार्रवाई सिर्फ एक गांव की घटना नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा का संदेश है। अब सवाल यह है – क्या हम करोड़ों की सरकारी जमीन हड़पने वालों को “गरीब” कहकर बचाना चाहते हैं, या कानून के समान पालन पर जोर देंगे? निष्पक्ष सोच का समय है।










































