बिलासपुर : ‘पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती’ ये लाइन तो आपने सुनी होगी, लेकिन आज के आज के समय कलियुग बेटों की असली तस्वीरें देखने को मिल रही है। कलयुगी बेटे-बहू की शर्मनाक हरकत पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए बेटे-बहू को घर से बेदखल करने के फैसले पर मुहर लगा दी है। मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के सिंगल बेंच ने कहा कि यदि बच्चे अपने बुजुर्ग मातापिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, तो उसे घर से बेदखल किया जा सकता है।
बेटा-बहू को बेदखल कर सकती है मां
दरअसल बिलासपुर मिनोचा कालोनी निवासी 93 वर्षीय बुजुर्ग महिला संतोष खन्ना ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में एक आवेदन पेश किया था। बुजुर्ग महिला का आरोप था कि उसके मकान के पहले मंज़िल पर रहने वाले बड़े बेटे देवेन्द्र खन्ना और बहु नीरजा खन्ना उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं। बुजुर्ग महिला ने अपने जीवन खत्म करने की आशंका के साथ बेटे बहु को घर से बेदखल करने की गुहार लगाई थी। बुजुर्ग महिला की ओर से पेश किए गए आवेदन पर जांच के बाद मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2024 को बेटा-बहू को घर खाली करने का आदेश दिया था।
मां को प्रताड़ित करते थे बेटा-बहू
मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल से फैसला आने के बाद बेटा-बहू ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष भी अपील की, लेकिन जब यहां भी उन्हें राहत नहीं मिली तो हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने भी मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल के आदेश को सही ठहराया है। कोर्ट ने बेटे और बहू की याचिका खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल के बेदखली के आदेश को सही ठहराया है। कोर्ट ने अपने इस महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 केवल भरण पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य बुजुर्गों के उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मान, शांति और सुरक्षा देना भी है।
क्या है वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 ?
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 (MWPSC Act) एक महत्वपूर्ण भारतीय कानून है, जिसके तहत 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्गों और माता-पिता को उनके बच्चों या रिश्तेदारों से वित्तीय, चिकित्सा और संपत्ति संरक्षण का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
भरण-पोषण का अधिकार
जो बुजुर्ग अपनी आय या संपत्ति से अपना खर्च उठाने में असमर्थ हैं, वे अपने बालिग बच्चों (पुत्र, पुत्री) या वारिसों से मासिक भरण-पोषण (गुज़ारा भत्ता) पाने का दावा कर सकते हैं।
मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल
अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक उप-विभागीय अधिकारी (SDO) स्तर पर एक भरण-पोषण ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। बुजुर्ग सीधे आवेदन देकर ट्रिब्यूनल से अपने बच्चों को भरण-पोषण राशि देने का आदेश पारित करवा सकते हैं।
संपत्ति की सुरक्षा (धोखाधड़ी से बचाव)
यदि कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति किसी रिश्तेदार या संतान को इस शर्त पर देता है कि वे बुढ़ापे में उनकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करेंगे, और बाद में वे ऐसा करने से मुकर जाते हैं, तो ट्रिब्यूनल उस संपत्ति के हस्तांतरण (ट्रांसफर) को रद्द कर सकती है।
दंड का प्रावधान
ट्रिब्यूनल के आदेश के बावजूद भरण-पोषण न देने वाले बच्चों/रिश्तेदारों पर जुर्माना लगाया जा सकता है और उन्हें एक महीने तक की जेल या भुगतान होने तक की सजा भी हो सकती है।























