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Health Tip’s : फेफड़ों के कैंसर का खतरा सिर्फ धूम्रपान से नहीं, इस दुर्लभ जीन म्यूटेशन ने बढ़ाई चिंता; नए शोध में बड़ा खुलासा

Health Tip’s : यह खबर किसी वायरल दावे पर आधारित नहीं है। 17 सितंबर 2026 को Science में प्रकाशित एक peer-reviewed अध्ययन में 33.7 लाख से अधिक लोगों के आनुवंशिक डेटा का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि दुर्लभ विरासत में मिलने वाला EGFR T790M म्यूटेशन फेफड़ों के कैंसर के जोखिम से मजबूत रूप से जुड़ा है। हालांकि, इसे यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि हर गैर-धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर हो सकता है या यह म्यूटेशन आम है।

धूम्रपान न करने वालों में भी हो सकता है फेफड़ों का कैंसर

फेफड़ों के कैंसर को आमतौर पर धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है। धूम्रपान अब भी इसका सबसे प्रमुख जोखिम कारक है। लेकिन जिन लोगों ने कभी धूम्रपान नहीं किया, उनमें भी यह बीमारी हो सकती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में फेफड़ों के कैंसर के करीब 10 से 20 प्रतिशत मामले ऐसे लोगों में पाए जाते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया।

नए शोध ने इस सवाल को एक अलग दिशा दी है। शोधकर्ताओं ने EGFR T790M नाम के एक दुर्लभ आनुवंशिक म्यूटेशन और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध की जांच की। अध्ययन में 23andMe Research Institute के 33 लाख से अधिक research-consented प्रतिभागियों का de-identified genetic data शामिल था।

EGFR T790M म्यूटेशन क्या है?

EGFR यानी Epidermal Growth Factor Receptor जीन कोशिकाओं की वृद्धि और विभाजन से जुड़ा होता है। शोध में जिस T790M variant की पहचान की गई, वह सामान्य आबादी में बेहद दुर्लभ है। अध्ययन में इसके carriers में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम लगभग 25 गुना अधिक पाया गया।

सबसे बड़ा अंतर उन लोगों में देखा गया जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था। इस समूह में EGFR T790M mutation के carriers में बिना इस mutation वाले लोगों की तुलना में फेफड़ों के कैंसर की संभावना 60 गुना से अधिक थी। यह relative association है, यानी इसे किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत lifetime cancer risk के बराबर नहीं माना जा सकता।

क्या धूम्रपान न करने वालों को अब ज्यादा चिंता करनी चाहिए?

इस शोध का मतलब यह नहीं है कि हर non-smoker को genetic testing या lung cancer screening की जरूरत है। EGFR T790M बहुत दुर्लभ है। अध्ययन में इसकी prevalence लगभग 1 in 15,850 बताई गई। साथ ही, शोध ने यह साबित नहीं किया है कि इस mutation के carriers की व्यापक screening करने से मृत्यु दर कम होगी।

फेफड़ों के कैंसर के दूसरे ज्ञात जोखिम कारक भी मौजूद हैं। इनमें secondhand smoke, radon, asbestos और कुछ अन्य environmental exposures शामिल हैं। National Cancer Institute के अनुसार, धूम्रपान न करने वालों में secondhand smoke और radon फेफड़ों के कैंसर के स्थापित कारण हैं।

नए शोध से स्क्रीनिंग पर क्या असर पड़ सकता है?

फिलहाल lung cancer screening मुख्य रूप से smoking history और दूसरे स्थापित जोखिम कारकों को ध्यान में रखकर की जाती है। Dana-Farber Cancer Institute की शोधकर्ता Jaclyn LoPiccolo के अनुसार, नए निष्कर्ष भविष्य में inherited genetic risk को screening strategies में शामिल करने की संभावना उठाते हैं।

हालांकि, यह अभी भविष्य की संभावना है, मौजूदा universal screening recommendation नहीं। इसलिए केवल इस अध्ययन के आधार पर बिना चिकित्सकीय सलाह के CT scan या genetic test कराने का फैसला नहीं करना चाहिए।

क्या भारत में भी यह जानकारी महत्वपूर्ण है?

भारत में भी lung cancer के मरीजों में EGFR सहित कई genetic alterations पाए जाते हैं। एक भारतीय cohort study में EGFR mutations non-smokers में ever-smokers की तुलना में अधिक आम पाए गए थे। हालांकि, उस अध्ययन के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में EGFR T790M का prevalence नए Science अध्ययन के समान है।

इसलिए भारतीय पाठकों के लिए सबसे अहम संदेश यह है कि धूम्रपान न करना फेफड़ों के कैंसर का जोखिम खत्म नहीं करता। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि हर non-smoker उच्च जोखिम में है। लगातार खांसी, खून आना, सांस लेने में परेशानी या अन्य चिंताजनक लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

शोध की सबसे बड़ी सीमा क्या है?

अध्ययन बहुत बड़े genetic dataset पर आधारित है, लेकिन इसका मुख्य निष्कर्ष एक दुर्लभ genetic variant और lung cancer के बीच association को दर्शाता है। यह अपने आप में यह साबित नहीं करता कि mutation वाले प्रत्येक व्यक्ति को कैंसर होगा। शोधकर्ताओं ने screening के लाभ को भी अभी स्थापित नहीं किया है।

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