रायपुर : छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज आउटसोर्सिंग कंपनियों से जुड़े कर्मचारियों की स्थिति पर महत्वपूर्ण चर्चा देखने को मिली। वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने इस विषय को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि प्रदेश में आउटसोर्सिंग कंपनियों के संचालन और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए कोई स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमन के अभाव में कर्मचारियों का व्यवस्थित रूप से शोषण हो रहा है। अजय चंद्राकर ने सदन में कहा कि वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ में एक लाख से अधिक लोग आउटसोर्सिंग कंपनियों के माध्यम से कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी नौकरी की सुरक्षा, वेतन संरचना और सामाजिक सुरक्षा को लेकर स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रदेश में कुल कितनी आउटसोर्सिंग कंपनियां सक्रिय हैं, इसकी आधिकारिक जानकारी तक उपलब्ध नहीं है। उनके अनुसार, यह प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है। चंद्राकर ने कहा कि यदि आउटसोर्सिंग कंपनियों को विधिवत अधिनियमित किया जाए, तो हजारों युवाओं को स्थायी और सुरक्षित रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के वर्गीकरण को लेकर भी प्रश्न किया कि ऐसे वर्कर संगठित या असंगठित किस क्षेत्र में आते हैं। इस पर उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन ने स्पष्ट किया कि आउटसोर्सिंग के तहत कार्यरत कर्मचारी पारंपरिक अर्थों में न तो संगठित क्षेत्र में आते हैं और न ही असंगठित क्षेत्र में।
सरकार की ओर से जवाब देते हुए मंत्री देवांगन ने कहा कि इस विषय पर भारत सरकार द्वारा नियम बनाए जा रहे हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार के नियमों के अनुरूप छत्तीसगढ़ में भी आवश्यक प्रावधान किए जाएंगे। साथ ही उन्होंने जानकारी दी कि राज्य स्तर पर इस विषय के अध्ययन और सुझावों के लिए एक समिति गठित की गई है और प्रक्रिया जारी है। हालांकि, अजय चंद्राकर ने सरकार के जवाब पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य को इस विषय पर स्वतंत्र रूप से विचार कर जल्द से जल्द अधिनियम लाना चाहिए। उनका तर्क था कि स्पष्ट कानून बनने से कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा होगी और शोषण की संभावनाएं कम होंगी।
मंत्री देवांगन ने अपने जवाब में यह भी उल्लेख किया कि फिलहाल किसी भी राज्य में आउटसोर्सिंग कंपनियों के लिए अलग से अधिनियम लागू नहीं है। इस बयान ने सदन में नई बहस को जन्म दिया, जहां विपक्ष ने इसे पहल करने का अवसर बताया, जबकि सरकार ने केंद्र के दिशानिर्देशों का इंतजार करने की बात दोहराई। सदन में हुई यह चर्चा प्रदेश में आउटसोर्सिंग व्यवस्था से जुड़े लाखों युवाओं के भविष्य और कार्यस्थल सुरक्षा के मुद्दे को लेकर एक गंभीर नीति-स्तरीय बहस की ओर संकेत करती है। अब देखना होगा कि समिति की सिफारिशों और केंद्र सरकार के नियमों के आधार पर राज्य सरकार इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाती है।











































