कोरबा : छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा अक्सर सत्ता के मंचों से सुनाई देती है। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों को कटघरे में खड़ा कर देती है। कुछ ऐसा ही मामला कोरबा जिले में सामने आया है, यहां लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं में घिरे एक पंचायत सचिव को निलंबन के महज डेढ़ माह के भीतर ही बहाल कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कार्रवाई की प्रक्रिया भी इतनी तेज़ी से आगे बढ़ी कि निलंबन आदेश के ठीक अगले दिन आरोप पत्र जारी कर बहाली की राह लगभग साफ कर दी गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिये हैं। गौरतलब है कि कोरबा के पोड़ी-उपरोड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत लालपुर के सचिव मोहम्मद हसन के खिलाफ गंभीर शिकायत थी। गांव के लोगों ने सचिव के लिखाफ 15वें वित्त की राशि के गबन और भ्रष्टाचार के सबूत के साथ तत्कालीन कलेक्टर अजीत वसंत से शिकायत की थी। ग्रामीणों ने आरोप लगाया था कि सचिव ने सरपंच के साथ मिलकर गांव में बनने वाले सड़क और मंच के नाम पर लाखों रूपये का आहरण कर लिया गया, जबकि गांव में उक्त सड़क और मंच बने ही नहीं।
इसके साथ ही सचिव पर सरकारी कर्मचारी को प्रधानमंत्री आवास आबंटन के साथ ही मनरेगा की राशि का अंतरण किये जाने की शिकायत की थी। कलेक्टर के निर्देश पर जिला पंचायत सीईओं दिनेश कुमार नाग ने 13 अक्टूबर 2025 को चार सदस्यी टीम गठित कर एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया था। लेकिन सीईओं के आदेश के बाद भी जांच एक सप्ताह की जगह करीब 56 दिन में पूरी हो सकी। जांच में पंचायत सचिव मोहम्मद हसन के खिलाफ मिली शिकायत सही मिली, मौके पर जांच में न तो सड़क मिली और ना ही मंच।
कागजों में सड़क और मंच बनाने वाले सचिव को जांच टीम ने लाखों रूपये की आर्थिक अनियमितता का दोषी पाया। जिसके बाद जिला पंचायत सीईओं ने 9 दिसंबर 2025 को कारण बताओं नोटिस जारी कर सचिव से जवाब मांगा गया। संतोषप्रद जवाब नही मिलने पर भ्रष्ट सचिव को 15 दिसंबर 2025 को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। लेकिन इस निलंबन के महज डेढ़ महीने बाद ही 4 फरवरी 2026 को भ्रष्टाचार के दोषी सचिव को बहाल करने का आदेश जारी कर दिया गया।
वसूली और FIR की जगह डेढ़ महीने में भ्रष्ट सचिव की बहाली
ग्राम पंचायत लालपुर के पंचायत सचिव से जुड़े आर्थिक अनियमितता के मामले में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर अब कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सचिव के खिलाफ पहले से ही कई शिकायतें थी। बावजूद उसे राजनीतिक प्रभाव के चलते न केवल लालपुर, बल्कि उसी क्षेत्र के दो अन्य ग्राम पंचायतों की भी जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। ग्राम पंचायत लालपुर में हुए भ्रष्टाचार की जांच में लाखों रुपये की आर्थिक अनियमितता सामने आने पर सचिव को निलंबित तो किया गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो उससे गबन की राशि की वसूली की गई और न ही इस मामले में पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई। उल्टा निलंबन के महज डेढ़ महीने के भीतर ही उसे बहाल कर पोड़ी-उपरोड़ा ब्लॉक में ही पदस्थ कर दिया गया। जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
निलंबन के एक दिन बाद ही जारी किया आरोप पत्र
भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को किस तरह संरक्षण दिया जाता है, इसकी झलक जिला पंचायत कोरबा के इस मामले में साफ दिखाई दे रही है। सामान्य तौर पर आर्थिक अनियमितता के मामलों में निलंबन के बाद आरोप पत्र जारी कर सभी पक्षों को सुनने के बाद लगभग 90 दिन के भीतर आगे की कार्रवाई की जाती है। लेकिन लालपुर के सचिव मो. हसन के मामले में प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज दिखाई दी। 15 दिसंबर को निलंबन आदेश जारी होने के महज एक दिन बाद 17 दिसंबर 2025 को आरोप पत्र भी जारी कर दिया गया। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि मामले को जल्द निपटाकर सचिव की बहाली का रास्ता तैयार किया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला पंचायत सीईओ के निर्देश के अनुसार सात दिनों में पूरी होने वाली जांच में आखिर 56 दिन क्यों लग गए? साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद सचिव से लाखों रुपये की वसूली क्यों नहीं की गई और पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने से अफसर क्यों बच रहे है ? पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर जिला पंचायत कोरबा की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना यह होगा कि इस मामले में जिम्मेदार अफसर समय रहते कोई ठोस कार्रवाई करते है या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है। ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।

























