Bilashpur

CG High Court : बेडरूम में लगे CCTV की फुटेज को माना जा सकता है साक्ष्य, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को दिए निर्देश

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे के दौरान सीसीटीवी फुटेज, सीडी, वीडियो या अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उनके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-बी का प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के दो आदेशों को निरस्त करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया है। यह आदेश पति की ओर से दायर अपील पर पारित किया गया।

क्या है पूरा मामला

मामला रायगढ़ निवासी एक दंपती से जुड़ा है, जिनके बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने फैमिली कोर्ट में पत्नी के खिलाफ क्रूरता और आपत्तिजनक आचरण का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। वहीं, पत्नी ने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए अलग से आवेदन दिया था। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी के अन्य पुरुषों के साथ अनैतिक संबंध हैं और वह उनसे अश्लील चैटिंग तथा न्यूड व अश्लील वीडियो कॉल करती है। इन आरोपों को साबित करने के लिए पति ने कथित तौर पर बेडरूम में चुपचाप सीसीटीवी कैमरा लगवाया और उससे प्राप्त वीडियो फुटेज को एक कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) में सुरक्षित कर फैमिली कोर्ट में साक्ष्य के रूप में पेश किया।

फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज किया साक्ष्य

महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को साक्ष्य मानने से इनकार करते हुए कहा था कि उसके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है। इसके साथ ही फैमिली कोर्ट ने पत्नी की दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली थी।

हाईकोर्ट का अहम हस्तक्षेप

फैमिली कोर्ट के इस आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। डिवीजन बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत फैमिली कोर्ट को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। इन धाराओं के अनुसार, फैमिली कोर्ट विवाद के प्रभावी और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या साक्ष्य को स्वीकार कर सकती है, भले ही वह साक्ष्य अधिनियम की तकनीकी शर्तों पर पूरी तरह खरा न उतरता हो।हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को केवल तकनीकी कमियों के आधार पर पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं है, खासकर तब जब वह विवाद के मूल प्रश्नों को स्पष्ट करने में सहायक हो सकता है।

दोबारा सुनवाई और जिरह के निर्देश

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को रिकॉर्ड पर ले और उस पर जिरह की अनुमति दे। साथ ही, तलाक और दांपत्य अधिकारों की बहाली से जुड़े दोनों मामलों की नए सिरे से सुनवाई कर जल्द से जल्द निपटारा किया जाए।कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यह मामला चार साल से अधिक समय से लंबित है, इसलिए फैमिली कोर्ट इसे प्राथमिकता के आधार पर सुने और शीघ्र निर्णय दे।

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