अंबिकापुर:- सरगुजा जिले में संचालित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्ध निजी स्कूलों में नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला सामने आया है। जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि कई स्कूल न केवल निर्धारित शैक्षणिक दिशा-निर्देशों की अनदेखी कर रहे हैं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य से भी समझौता किया जा रहा है।ताजा मामला न्यू पब्लिक स्कूल (न्यू डीपीएस) से जुड़ा है, जहां स्कूल शिक्षा विभाग की जांच में कई गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं।
छह किलो का बस्ता, 18 किलो का बच्चा
जांच के दौरान सबसे चिंताजनक तथ्य कक्षा पहली के छात्र आयन मंडल का मामला रहा। बच्चे का कुल वजन 18 किलोग्राम पाया गया, जबकि उसके स्कूल बैग का वजन छह किलोग्राम था।सीबीएसई के नियमों के अनुसार, किसी भी बच्चे के बस्ते का वजन उसके कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इस हिसाब से आयन का बैग अधिकतम 1.8 किलोग्राम होना चाहिए था, लेकिन वास्तविकता इससे कई गुना अधिक पाई गई।विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का अत्यधिक वजन बच्चों के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और भविष्य में रीढ़ व मांसपेशियों से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न कर सकता है।
निजी प्रकाशकों की किताबें, NCERT की अनदेखी
जांच में यह भी सामने आया कि स्कूल में नर्सरी से आठवीं तक के विद्यार्थियों को एनसीईआरटी की किताबों के स्थान पर निजी प्रकाशकों की महंगी पुस्तकें पढ़ाई जा रही थीं।यह CBSE के स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन है, जिसमें सरकारी मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। अभिभावकों का आरोप है कि निजी किताबों के कारण शिक्षा खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है।
एक ही दुकान से किताब खरीदने का दबाव
जांच टीम ने पाया कि स्कूल प्रबंधन द्वारा अभिभावकों को एक ही दुकान मेसर्स एमपी डिपार्टमेंटल स्टोर, अंबिकापुर से किताबें और कॉपियां बंडल के रूप में खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा था।पालकों ने शिकायत की कि इस व्यवस्था से उन्हें विकल्प नहीं मिलता और उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। यह स्थिति सीधे तौर पर उपभोक्ता अधिकारों और शिक्षा नियमों के खिलाफ मानी जा रही है।
पांच स्कूलों को नोटिस
अब तक अंबिकापुर शहर के पांच निजी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा चुका है। इनमें शामिल हैं:
बिरला इंटरनेशनल स्कूल
मोंटफोर्ट स्कूल
न्यू देलही पब्लिक स्कूल
कार्मेल स्कूल
ओरिएंटल पब्लिक स्कूल
इन सभी स्कूलों पर निजी प्रकाशकों की किताबें लागू करने और निर्धारित दुकान से सामग्री खरीदने के लिए बाध्य करने जैसे आरोप लगे हैं।





















