इंदौर : मध्यप्रदेश के इंदौर शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। खजराना स्थित सिविल अस्पताल पिछले करीब छह वर्षों से केवल सरकारी रिकॉर्ड में संचालित बताया जा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर न अस्पताल की इमारत है और न ही कोई स्वास्थ्य सेवाएं संचालित हो रही हैं। इसके बावजूद अस्पताल के नाम पर कर्मचारियों की पदस्थापना, तबादले और प्रशासनिक आदेश लगातार जारी हैं, जिससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार, खजराना सिविल अस्पताल के नाम पर वर्तमान में 87 कर्मचारियों की पदस्थापना दर्ज है। आश्चर्यजनक बात यह है कि जिस अस्पताल का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है, वहां कर्मचारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रक्रिया आज भी जारी है। हाल ही में 16 जून को देवास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ रीना चौहान वास्कले का तबादला इंदौर के इसी सिविल अस्पताल में किया गया। इसके बाद देवास स्तर पर जांच-पड़ताल में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित अस्पताल केवल सरकारी रिकॉर्ड में संचालित है।
बताया जा रहा है कि खजराना अस्पताल के लिए न कोई भवन उपलब्ध है और न ही अस्पताल के संचालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा मौजूद है। बावजूद इसके, विभागीय दस्तावेजों में अस्पताल को सक्रिय दर्शाया जा रहा है। इससे वर्षों से वेतन और अन्य प्रशासनिक खर्चों के औचित्य पर भी सवाल उठने लगे हैं। मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। बिना अस्तित्व वाले अस्पताल के नाम पर कर्मचारियों की तैनाती और तबादले किस आधार पर किए जा रहे हैं
तथा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं, इसे लेकर जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। यह मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि विभाग इस पूरे प्रकरण की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह स्वास्थ्य प्रशासन में बड़ी लापरवाही और सरकारी व्यवस्था की गंभीर खामी का मामला माना जाएगा।























