बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव क्षेत्र से जुड़े 2003 के एक दुष्कर्म मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी मूलचंद को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 7 साल की सजा को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है।
कोर्ट ने अपनी समीक्षा में पाया कि पीड़िता की गवाही ‘स्टर्लिंग क्वालिटी’ की नहीं थी और उसमें कई गंभीर विरोधाभास मौजूद थे। विशेष रूप से यह तथ्य कि घटना के बाद भी दोनों साथ रहे और पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि यदि आरोपी उसे अपना लेता तो वह रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती, मामले को संदिग्ध बनाता है। इसके अतिरिक्त, घटना स्थल के घनी बस्ती में होने के बावजूद शोर न सुनाई देना, एफआईआर में 8 दिनों की देरी, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से मेडिकल व एफएसएल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि न होना आरोपी के पक्ष में गया।
न्यायालय ने अपने आदेश में यह सिद्धांत दोहराया कि यद्यपि दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता की अकेली गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकती है, लेकिन इसके लिए बयान का पूरी तरह विश्वसनीय, सुसंगत और संदेह से परे होना अनिवार्य है, जो इस प्रकरण में अनुपस्थित था।






















