रायपुर : छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान कलाकार और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्ष की उम्र में उन्होंने रायपुर एम्स में रात 3:15 बजे अंतिम सांस ली। लंबे समय से बीमार चल रही तीजन बाई के निधन से लोक कला जगत ने अपनी सबसे बुलंद आवाज खो दी है। उनके जाने से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश में शोक की लहर है।
गांव की बेटी बनी दुनिया की पहचान
भिलाई के गनियारी गांव से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने वाली तीजन बाई ने अपने अद्भुत गायन से पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को जिस जीवंत अंदाज में वे मंच पर प्रस्तुत करती थीं, उसने देश-विदेश के लाखों लोगों को भारतीय लोक परंपरा से जोड़ा। उनकी कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत विरासत थी।
जब मंच पर उतरती थीं, तो जीवंत हो उठता था महाभारत
हाथ में तंबूरा, दमदार आवाज और अभिनय से भरपूर प्रस्तुति… यही थी तीजन बाई की पहचान। उनकी पंडवानी सुनने वाले खुद को महाभारत के युद्ध, पात्रों और घटनाओं के बीच महसूस करते थे। उनकी शैली ने लोकगायन को आधुनिक मंचों तक पहुंचाया और नई पीढ़ी को भी इस परंपरा से जोड़ दिया।
समाज के विरोध को बनाया अपनी ताकत
24 अप्रैल 1956 को जन्मीं तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पारधी समाज से आने वाली तीजन बाई को एक समय पंडवानी गाने के कारण समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी कला को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और विरोध को अपनी ताकत में बदल दिया।
महिलाओं के लिए बदली पंडवानी की परंपरा
उस दौर में महिलाएं बैठकर पंडवानी गाती थीं, लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने पुरुष कलाकारों की तरह खड़े होकर कापालिक शैली में प्रस्तुति देना शुरू किया और इतिहास रच दिया। उनकी यह पहल भारतीय लोक कला में महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन गई।
नाना से मिली सीख, दुनिया ने किया सम्मान
बचपन में नाना ब्रजलाल से महाभारत की कहानियां सुनते-सुनते उनमें पंडवानी के प्रति प्रेम जागा। बाद में लोकगायक उमेद सिंह देशमुख से प्रशिक्षण लिया और महज 13 साल की उम्र में पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी। शिक्षा के अवसर सीमित रहे, लेकिन कला ने उन्हें दुनिया के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी.लिट की उपाधियां प्रदान कीं।
सम्मानों से भरा रहा सफर
डॉ. तीजन बाई को भारतीय लोक संस्कृति में उनके अतुलनीय योगदान के लिए पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले। उन्होंने दशकों तक भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हुए दुनिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुति दी।
एक युग का अंत, लेकिन विरासत अमर रहेगी
डॉ. तीजन बाई भले ही इस दुनिया से विदा हो गई हों, लेकिन उनकी आवाज, उनका संघर्ष और उनकी कला हमेशा जीवित रहेगी। उन्होंने पंडवानी को केवल मंच तक नहीं पहुंचाया, बल्कि उसे विश्व संस्कृति का हिस्सा बना दिया। आने वाली पीढ़ियां उन्हें भारतीय लोक कला की सबसे बड़ी प्रेरणा के रूप में हमेशा याद रखेंगी।























