कोरबा : कोरबा जिले में कानून व्यवस्था पर शातिर बदमाश ग्रहण लगा रहे है। शहर के बीचों-बीच हुई सनसनीखेज वारदात में एएसआई के इकलौते बेटे की आज मौत हो गयी। इस वारदात के 5 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस मुख्य आरोपियों तक नहीं पहुंच सकी है।
ऐसे में एक बार फिर जिले में अपराधियों के बुलंद हौसले और आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होना पुलिस की कार्यप्रणाली और दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। गौरतलब है कि 6-7 जून की दरम्यानी रात बुधवारी बायपास मार्ग पर हुए विवाद के बाद बोलेरो सवार बदमाशों ने एएसआई रामनारायण रात्रे के इकलौते बेटे चंद्रमणि को बोलेरो वाहन से कुचल दिया था। गंभीर रूप से घायल चंद्रमणि को रायपुर रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान आज उसकी मौत हो गई।
हादसे के बाद यह मामला अब हत्या में तब्दील हो चुका है। हैरानी की बात यह है कि घटना के तत्काल बाद चंद्रमणि के साथी अरविंद राठौर और साहिल निर्मलकर ने बोलेरो का पीछा किया था। इसी दौरान अरविंद का कथित अपहरण कर उसे बलगी मोड़ के पास ले जाकर बंधक बनाया गया, और बेरहमी से मारपीट कर दहशत फैलाने के लिए हथियार लहराते हुए हवाई फायरिंग भी की गई। पीड़ित ने नकदी, आईफोन, सोने की चेन और अंगूठी लूटे जाने का आरोप भी लगाया है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि….जब पीड़ित ने घटना के दूसरे दिन ही कुछ आरोपियों की पहचान पुलिस को बता दी थी, तब भी अब तक इस वारदात के मुख्य आरोपिायों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकी ? आखिर ऐसे कौन से कारण हैं कि पुलिस को सुराग मिलने के बावजूद कार्रवाई जमीन पर नजर नहीं आ रही ? सूत्रों की मानें तो इस पूरे घटनाक्रम के तार क्षेत्र में सक्रिय अवैध कारोबार और डीजल चोरी के नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंच रहे हैं। यदि यह तथ्य सही है, तो यह मामला केवल हीट एंड रन या मारपीट का नहीं, बल्कि संगठित आपराधिक गतिविधियों का भी हो सकता है।
ऐसे में पुलिस की धीमी कार्रवाई कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही है। कोरबा पुलिस लगातार ‘सजग कोरबा-सतर्क कोरबा‘ अभियान के जरिए अपराध पर नियंत्रण के दावे करती रही है, लेकिन शहर के मुख्य मार्ग पर हुई इस बड़ी वारदात ने उन दावों की हकीकत उजागर कर दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि पुलिस विभाग के ही एक एएसआई के बेटे को न्याय दिलाने में जब इतनी देरी हो रही है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था का क्या हाल होगा ?
चंद्रमणि की मौत के बाद परिजनों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। ऐसे में सबकी नजरें पुलिस प्रशासन पर टिकी हैं कि वह आरोपियों की गिरफ्तारी कब तक कर पाती है। सवाल ये भी कि क्या वास्तव में ‘सजग कोरबा-सतर्क कोरबा‘ केवल एक नारा है या फिर अपराधियों पर कार्रवाई का कोई ठोस तंत्र भी मौजूद है। फिलहाल इस घटना ने पुलिस की कार्यशैली, खुफिया तंत्र और अपराध नियंत्रण की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।























