कोरबा : कोरबा नगर सेना में उपजे गंभीर विवाद ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्य प्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक नगर सैनिक की बर्खास्तगी के बाद आत्महत्या की कोशिश और लगातार लगते गंभीर आरोपों के बाद आखिरकार सरकार ने जिला सेनानी अनुज एक्का को कोरबा से हटाकर रायपुर स्थित केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थान में संबद्ध कर दिया गया है। लेकिन सवाल अब भी वही कि आखिर सिस्टम को कटघरे में लाने वालों अफसरों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की जाती ? और सवाल ये भी कि क्या विभाग की गरिमा को धूमिल करने वाले ऐसे अफसरों पर आने वाले दिनों में कानूनी कार्रवाई की जायेगी, ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके ?
गौरतलब है कि कोरबा जिले में पिछले डेढ़ माह से नगर सेना के जिला सेनानी अनुज एक्का के खिलाफ जवानों ने मोर्चा खोल रखा था। जिला सेनानी के कथित तानाशाही रवैये, महिला जवानों के साथ अमर्यादित व्यवहार और विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के आरोपों नगर सेना के महिला-पुरूष जवान आंदोलन कर रहे थे। जांच के दौरान जब नगर सैनिक संतोष पटेल ने संभागीय सेनानी के समक्ष विभागीय भ्रष्टाचार को उजागर किया। तब जवाबदार अफसर ने उल्टे जवान पर बर्खास्तगी की कार्रवाई कर आंदोलन कर रहे जवानों पर कार्रवाई का दबाव बनाने का प्रयास किया गया।
लेकिन होमगार्ड जवानों की मांग पर समय रहते न तो किसी राजनेता की नजर पड़ी और ना ही सरकारी सिस्टम ने इस पूरे मामले पर गंभीरता दिखाते हुए संज्ञान लिया। जिससे परेशान होकर 26 जनवरी को बर्खास्तगी से मानसिक रूप से आहत संतोष पटेल ने जहर सेवन कर आत्महत्या की कोशिश की। इस घटना ने पूरे विभाग को झकझोर कर रख दिया। घटना के बाद जवानों में भारी आक्रोश फैल गया और एक बार फिर जिला सेनानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया। मामला मीडिया और प्रदेश स्तर तक पहुंचा। जिससे बाद जाकर दबाव बढ़ने पर अंततः जिला सेनानी अनुज एक्का का हटाने का फैसला लिया गया।
तबादले के बाद भी सिस्टम पर उठ रहे सवाल….!
कोरबा नगर सेना से जुड़ा मामला सिर्फ एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है। जहां शिकायत करने वाला ही सज़ा का भागीदार बन जाता है और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं। होमगार्ड जवान की आत्महत्या की कोशिश के बाद सरकार का हरकत में आना बताता है कि संवेदनशीलता अब भी घटनाओं की गंभीरता से नहीं, बल्कि उसके सार्वजनिक दबाव से तय होती है। जिला सेनानी अनुज एक्का पर तानाशाही रवैये महिला जवानों के साथ अमर्यादित व्यवहार जैसे गंभीर आरोप लगते रहे। इन आरोपों को लेकर जवान पिछले डेढ़ माह से संघर्ष कर रहे थे।
लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल नहीं की गई। सवाल यह है कि यदि समय रहते शिकायतों पर कार्रवाई होती, तो क्या एक जवान को आत्महत्या जैसा कदम उठाने की नौबत आती ? वहीं दूसरी तरफ आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले अफसरों के खिलाफ घटना के 48 घंटे बाद भी एफआईआर दर्ज न होना कानून के समान प्रयोग पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। ऐसे में अब ये देखने वाली बात होगी कि इस पूरे मामले पर सरकार दोषी अफसर के खिलाफ समय रहते अपराध दर्ज करने का आदेश देती है, ताकि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके ? या फिर जांच के नाम पर इस पूरे मामले पर समय की धूल जम जाती है, ये तो आने वाला वक्त बतायेगा।






















